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पशुधन को बचाने हेतु भूमाफिया से गौचर भूमि बचाना जरुरी है

Friday, August 30, 20131comments

राजस्थान में राजपूत शासनकाल में हर गांव,क़स्बा व नगर के पास गौचर भूमि छोड़ने की परम्परा प्रचलित थी और इसी परम्परा के तहत राजस्थान के हर राजा, सामंत,जागीरदार, ठिकानेदार ने अपने अपने सामर्थ्यनुसार अपने क्षेत्र में गौचर भूमियाँ छोड़ी जो भूमि उन्होंने या उनके पूर्वजों ने अपना खून बहा, सिर कटवाकर हासिल थी|

राजस्थान के सेठ साहूकारों ने भी इन गौचर भूमियों जिन्हें ओरण के नाम से भी जाना जाता है में पशुधन के लिए पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए समय समय पर पक्के तालाब तक बनवाये| इन सार्वजनिक चरागाहों के रूप में छोड़े गए गौचर भूमियों व ओरणों के आस-पास रहने वाले पशुपालकों का पशुधन बड़े आराम से पलता फूलता रहा है|

पर अफ़सोस आजादी के बाद इन गौचर भूमियों व ओरणों की भूमि पर भूमाफियों, प्रशासनिक अधिकारीयों व ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों द्वारा मिलीभगत कर कब्जे कर अतिक्रमण करवाये गए जो सतत जारी है, जिसकी वजह से गौचर भूमियाँ व ओरण सिमटते जा रहे है फलस्वरूप भूमिहीन छोटे पशुपालकों के पशुओं व गायों के लिए सार्वजनिक चरागाहों का संकट बढ़ता जा रहा है| जिस तरह ग्राम पंचायतें गौचर भूमि को आवासीय भूमि में बदलवा अपनी मर्जी से पट्टे बाँट कर कब्जे दे रही है उसके चलते भविष्य में इन प्राचीन परम्परागत चारागाहों के सिमटने से गायों सहित अन्य पशुओं के लिए चारे व चरागाहों का संकट बढ़ना निश्चित है| सार्वजनिक चरागाहों की कमी के चलते आम किसान को भी नुकसान होगा, क्योंकि आवारा पशु चारागाहों की कमी के चलते अपनी भूख मिटाने को किसानों की खड़ी फसलों नुकसान पहुँचायेंगे, जिससे किसान को नुकसान तो होगा ही साथ फसल की रखवाली के उसे ज्यादा समय देना पड़ेगा|

इन गौचर भूमियों व ओरणों की भूमि पर अवैध कब्जों के मामले में प्रशासन ने एक तरफ जहाँ आँखें मूंद रखी है वहीँ दूसरी और किसी अतिक्रमण की शिकायत करने पर भी उत्तरदायी अधिकारीयों के कानों पर जूं तक नहीं रैंगती और बल्कि शिकायत कर्ता को टालने के लिए जिम्मेदार अधिकारी अतिक्रमण हटाने हेतु स्वयं शिकायतकर्ता को संसाधन यथा बुल्डोजर, ट्रक, ट्रेक्टर आदि जुटाने का कह टाल देते है| क्योंकि हर शिकायतकर्ता के लिए ये संसाधन जुटाना आसान नहीं होता|

हाल में ही में सीकर जिले के भगतपुरा गांव का ऐसा ही उदाहरण सामने आया| भगतपुरा गांव के कुछ जागृत युवाओं की गौचर भूमि पर अतिक्रमण की शिकायत पर दांतारामगढ तहसीलदार ने गौचर भूमि पर अतिक्रमण हटाने के अपने अधीनस्थ अधिकारी को आदेश जारी कर दिए पर इस आदेश के महीने भर से ज्यादा गुजरने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी ने अभी तक अतिक्रमण हटाना जरुरी नहीं समझा| शिकायतकर्ताओं द्वारा अतिक्रमण हटाने का आग्रह करने पर ये अधिकारी महोदय शिकायतकर्ताओं को अतिक्रमण हटाने हेतु संसाधन जुटाने की व्यवस्था करने का कह टाल देते है जबकि अतिक्रमण हटाने हेतु संसाधनों की जिम्मेदारी खुद प्रशासन की है|

इस मामले में ग्राम पंचायत के सरपंच पति का कहना है कि सरपंच ने इन अतिक्रमणों की शिकायत प्रशासन से कर दी| चूँकि गौचर भूमि तहसीलदार के अधीन है अत: अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है| इस तरह तहसील अधिकारी व ग्राम पंचायत एक दुसरे पर जिम्मेदारी डाल अतिक्रमणकारियों का सीधा बचाव कर रहे है|

गौचर भूमियों पर अतिक्रमण हटाने के मामलों में प्रशासन द्वारा इस तरह की असंवेदनशीलता व गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाने के चलते अतिक्रमणधारियों के हौसले बुलंद होते जा रहे है और गौचर भूमियाँ कम होती जा रही है, जिसका सीधा प्रभाव स्थानीय भूमिहीन पशुपालकों पर तो पड़ ही रहा है साथ ही गौचर व ओरणों की भूमि पर अवैध निर्माण के लिए तेजी से पेड़ भी काटे जा रहे है, जिससे पेड़ों की कमी होती जा रही है जो पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह है|

पर अफ़सोस गौचर भूमि को बचाने के मामले में अभी तक बहुत कम लोग आये है, मैं नमन करता हूँ महंत गोपालदास जी का जो महीनों से गौचर भूमि बचाने हेतु आमरण अनशन पर बैठे है व साधुवाद देता हूँ श्री देवी सिंह जी भाटी को कि उन्होंने गौचर भूमि बचाने के लिए अभियान चला रखा है| प्रदेश की युवा शक्ति से भी मेरी अपील है कि वे अपने अपने गांवों की गौचर भूमि पर अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ उठ खड़े हों और गौचर को अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराने का बीड़ा उठाये|

अभिमन्यु सिंह राजवी

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